जौनसार का शेर: शहीद केसरी चंद और रामताल मेले की गौरवगाथा cover story Culture story by TeamYouthuttarakhand - April 29, 2026April 29, 2026 शहीद केसरी चंद जी की यह गाथा और जौनसार-बावर की यह अटूट देशभक्ति हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उत्तराखंड के रणबांकुरों पर अटूट विश्वास इस बात का प्रमाण है कि हमारी देवभूमि ‘वीरभूमि’ भी है। “जौनसार का शेर” और “खत” प्रणाली “उत्तराखंड की पहाड़ियों में केवल बादलों का बसेरा नहीं है, बल्कि यहाँ की मिट्टी वीर शहीदों के रक्त से अभिसिंचित है। जब हम जौनसार-बावर की बात करते हैं, तो ज़हन में एक ही नाम गूंजता है— अमर शहीद केसरी चंद। मात्र 24 साल की उम्र, जहाँ युवा अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में इस वीर ने भारत माँ की बेड़ियों को काटने के लिए मौत को गले लगा लिया।” यहाँ शहीद केसरी चंद और चकराता के रामताल मेले पर आधारित एक विस्तृत और प्रभावशाली लेख प्रस्तुत है: जौनसार का शेर: शहीद केसरी चंद और रामताल मेले की गौरवगाथा उत्तराखंड की पावन धरा ने इतिहास के हर कालखंड में ऐसे शूरवीरों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हंसते-हंसते प्राणों की आहुति दी। इन्हीं अमर नायकों में एक गौरवशाली नाम है— शहीद केसरी चंद। जौनसार-बावर के इस वीर सपूत की गाथा आज भी हिमालय की वादियों में गूँजती है और हर साल ३ मई को आयोजित होने वाला ‘रामताल मेला’ उनकी इसी वीरता का जीवंत स्मारक है। वीरता का उदय: क्यावा गाँव से इंफाल के मोर्चे तक केसरी चंद का जन्म १ नवंबर १९२० को जौनसार-बावर के क्यावा गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर देशभक्ति का जज्बा हिलोरे मार रहा था। १९४१ में वे ‘रॉयल आर्मी सर्विस कोर’ में भर्ती हुए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब वे जापानियों द्वारा युद्धबंदी बनाए गए, तब उनकी मुलाकात नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई। नेताजी के “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के आह्वान ने केसरी चंद के भीतर की ज्वाला को प्रज्वलित कर दिया। वे आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल हो गए। इंफाल और कोहिमा के मोर्चों पर उन्होंने एक निडर ‘गुरिल्ला योद्धा’ के रूप में ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया। पुलों को उड़ाना हो या रसद रोकना, केसरी चंद हर मिशन में मौत को मात देते रहे। सर्वोच्च बलिदान: २ साल की उम्र और फांसी का फंदा एक साहसिक मिशन के दौरान वे ब्रिटिश सेना द्वारा बंदी बना लिए गए। उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, लेकिन वे अडिग रहे। ३ मई १९४५ वह ऐतिहासिक दिन था जब दिल्ली की तिहाड़ जेल में उन्हें फांसी दी गई। चश्मदीद कहते हैं कि मात्र २४ वर्ष के उस नौजवान ने फांसी के फंदे को चूमते हुए उसे खुद अपने गले में डाल लिया। “जौनसार के इस शेर” ने साबित कर दिया कि पहाड़ की जवानी देश के काम आने के लिए ही बनी है। रामताल मेला: संस्कृति और राष्ट्रवाद का संगम शहीद केसरी चंद के इसी बलिदान को अमर बनाने के लिए हर साल ३ मई को चकराता के खूबसूरत रामताल गार्डन में एक भव्य मेले का आयोजन होता है। यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि जौनसार की ‘जवानी’ और ‘विरासत’ का महोत्सव है। श्रद्धांजलि और सम्मान: मेले की शुरुआत शहीद केसरी चंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण और सेना व पुलिस द्वारा दिए जाने वाले ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ से होती है। लोक संस्कृति की झलक: यहाँ जौनसार की प्रसिद्ध ‘खत’ प्रणाली का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। पारंपरिक रंगीन वेशभूषा में सजे ग्रामीण जब हारुल, तांदी और रासो जैसे लोक नृत्य करते हैं, तो पूरा वातावरण पहाड़ी संस्कृति के रंगों में रंग जाता है। एकता का प्रतीक: इस मेले में लाखों की संख्या में लोग न केवल उत्तराखंड से, बल्कि देशभर से शहीद को नमन करने पहुँचते हैं। यह सामाजिक मिलन और आपसी भाईचारे का एक सशक्त माध्यम है। नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा आज जब हम स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं, तो शहीद केसरी चंद जैसे नायकों का स्मरण करना हमारा परम कर्तव्य है। रामताल मेला नई पीढ़ी को यह संदेश देता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना और राष्ट्र के प्रति समर्पित होना ही सच्ची नागरिकता है। शहीद केसरी चंद आज भी जौनसार-बावर के लोक गीतों में जीवित हैं। उनके बलिदान का यह गौरवशाली अध्याय आने वाली कई सदियों तक युवाओं के भीतर राष्ट्रप्रेम की मशाल जलाता रहेगा। शहीद केसरी चंद अमर रहें! जय हिंद, जय उत्तराखंड! Share on Facebook Share Share on TwitterTweet Share on Pinterest Share Share on LinkedIn Share Share on Digg Share